कला-संस्कृति से जुड़ी संस्थाओं का हो पुनर्गठन
मार्च के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में साहित्य अकादेमी ने एक बड़ा साहित्य उत्सव का आयोजन किया। जानकारों के मुताबिक आयोजन पर करीब तीन करोड़ रुपए खर्च होते हैं। संगीत
मार्च के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में साहित्य अकादेमी ने एक बड़ा साहित्य उत्सव का आयोजन किया। जानकारों के मुताबिक आयोजन पर करीब तीन करोड़ रुपए खर्च होते हैं। संगीत

इन दिनों पूरे देश में फिल्म धुरंधर, द रीवेंज की सफलता की चर्चा हो रही है। इस फिल्म के निर्देशक आदित्य धर के निर्देशन के साथ-साथ इस फिल्म के कलाकारों
इस वर्ष जनवरी के आखिर में जब रानी मुखर्जी अभिनीत फिल्म मर्दानी-3 रिलीज हुई थी तब दिल्ली से लापता हो रही बच्चियों का मुद्दा जोर-शोर से उठा था। एक रिपोर्ट

औरत की देह इस समय मीडिया का सबसे लोकप्रिय विमर्श है । सेक्स और मीडिया के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है, उसने सारे मूल्यों को शीर्षासन करवा दिया है

राम का होना मर्यादाओं का होना है, रिश्तों का होना है, संवेदना का होना है, सामाजिक न्याय का होना है, करूणा का होना है। वे सही मायनों में भारतीयता के

शिक्षा का काम व्यक्ति को आत्मनिर्भर और मूल्यनिष्ठ मनुष्य बनाना है। जो अपनी विधा को साधकर आगे ले जा सके। मीडिया में भी ऐसे पेशेवरों का इंतजार है जो ‘फार्मूला पत्रकारिता’ से
आखिरकार साहित्य अकादेमी ने अपने वार्षिक पुरस्कारों की घोषणा कर ही दी। जैसी की साहित्य जगत में चर्चा थी उसी अनुसार अरुण कमल, अरविंदाक्षण और अनामिका की जूरी ने हिंदी

‘पोलिटिकल लाइन’ कहीं ‘पार्टी लाइन’ में न बदल जाए अब जबकि पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की रणभेरी बज चुकी है तो हमारे मीडिया जगत में भी इन दिनों ईरान-अमरीका
कुछ दिनों पूर्व नागिरीप्रचारिणी सभा, बनारस की फेसबुक वाल पर एक रील देखी जिसमें कवि अशोक वाजपेयी के वक्तव्य का एक अंश था। उस रील में अशोक वाजपेयी ने आचार्य

भारत में अखबारों के विकास की कहानी 1780 से प्रारंभ होती है, जब जेम्स आगस्टस हिक्की ने पहला अखबार ‘बंगाल गजट’ निकाला। कोलकाता से निकला यह अखबार हिक्की की जिद,

समय के साथ बदला है हमारा मीडिया, सामाजिक सरोकारों को छोड़कर पत्रकारिता संभव नहीं वक्त का काम है बदलना,वह बदलेगा। समय आगे ही जाएगा,यही उसकी नैसर्गिक वृत्ति है। ऐसे में

आरएसएस विचारक मनमोहन वैद्य की किताब कराती है भारतबोध -प्रो.संजय द्विवेदी हमारे राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विमर्श में ‘विचारों की घर वापसी’ का समय साफ दिखने लगा है। अचानक हमारी

भारतीय विज्ञापन जगत में जब भी मौलिकता, रचनात्मकता और भारतीय संवेदना की बात होगी तो सबसे पहले जिस शख्स का नाम सामने आयेगा वे हैं पीयूष पाण्डे। वे केवल विज्ञापन
“हे राम…….” ये गाँधी के मुँह से निकले अंतिम शब्द हैं। इस प्रसंग की अक्सर चर्चा होती है कि गाँधी ने ऐसा कहा था कि जब वे शरीर त्यागें तब
हिन्दी पत्रकारिता की आगामी दिशा: तकनीक, संवेदना और उत्तरदायित्व की त्रयी डॉ लाल बहादुर ओझा हिन्दी पत्रकारिता ने अपने 200 वर्षों के इतिहास में अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। ‘उदन्त मार्तण्ड’

अपने लेखन और प्रस्तुति से कहीं भी मीडिया को आतंकवाद के प्रति नरम रवैया नहीं अपनाना चाहिए ताकि जनता में आतंकी गतिविधियों के प्रति समर्थन का भाव न आने पाए।

बिहार में मुद्दा ‘लालूराज’ और ‘सुशासन बाबू’ ही हैं बिहार चुनाव हमेशा की तरह फिर जाति, बाहुबल और विकास के त्रिकोण में उलझा दिखता है। सामाजिक न्याय की ताकतों की
हिंदी पत्रकारिता के 200 साल की यात्रा का उत्सव मनाते हुए हमें बहुत से सवाल परेशान कर रहे हैं जिनमें सबसे खास है ‘संपादक का विस्थापन’। बड़े होते मीडिया संस्थान
पिछले महीने स्वाधीनता दिवस के आसपास झारखंड से कवि चेतन कश्यप ने अमृलाल नागर का एक आलोचक को लिखे पत्र, जो पुस्तकाकार भी प्रकाशित है, का स्क्रीन शाट भेजा। पुस्तक
आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते दखल और नित नई रंगत के साथ बदलती रोबोटिक्स की दुनिया ने यह तो तय कर ही दिया है कि पत्रकारिता के कुछ नए अध्याय गढ़ने
लगभग ढाई दशक से पत्रकारिता में सक्रिय अनंत विजय इस समय हिंदी में सबसे अधिक पढ़े जाने वाले समाचार पत्र दैनिक जागरण में कार्यरत हैं। उनको सिनेमा पर सर्वश्रेष्ठ लेखन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार स्वर्ण कमल से पुरस्कृत किया जा चुका है। उनको पत्रकारिता का सर्वोच्च सम्मान गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार और बिहार सरकार का फादर कामिल बुल्के सम्मान मिला है। उन्होंने अब तक 15 पुस्तकों का लेखन किया है।
पाठ्यक्रम समन्वयक, सेंटर ऑफ मीडिया स्टडीज़, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की भूमिका निभा रहे हैं । मीडिया, संवाद, पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखते हैं। कई पुस्तकों के लेखक।
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग में आचार्य और अध्यक्ष हैं। भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी), दिल्ली के महानिदेशक रह चुके हैं। 32 पुस्तकों का लेखन और संपादन किया है।
बीएचयू, वाराणसी में पढ़ाई के बाद जनसत्ता, कोलकाता और प्रभात खबर, राँची के साथ सक्रिय पत्रकारिता। आईआईएमसी, दिल्ली से अकादेमिक भूूमिका की शुरुआत। वर्तमान में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग में वरिष्ठ सहायक अध्यापक।
डॉ.पवित्र श्रीवास्तव, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंपर्क और विज्ञापन विभाग के अध्यक्ष हैं। देश के वरिष्ठ मीडिया अध्यापकों में शामिल हैं। फ़िल्म में विशेष रुचि। अनेक विश्वविद्यालयों के मीडिया विभागों में अध्ययन मंडल के सदस्य हैं।



WhatsApp us