ज्ञान-भारतम से बदलेगा इतिहास का लैंडस्केपअब यहां से कहां जाएं हमस्तरीय शोध-प्रकाशन को कैसे लगे पंखहिंदी पत्रकारिताः सबक 200 साल केभारतीय भाषाओं के वैश्विक पहचान की पहलमहात्मा फुले शताब्दी की समिति में साहित्यकार नीरजा माधव मनोनीतपत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं का हस्तांतरण नहीं न्याय की पक्षधरता हैकला-संस्कृति से जुड़ी संस्थाओं का हो पुनर्गठनरचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर बेईमानीफिल्मों से निकलते संदेश और हमारा समाजमीडिया में दिख रहा है किस औरत का चेहरा!भारतीय उच्चादर्शों को स्थापित करने वाले नायक हैं रामजनसंचार शिक्षा को सरोकारों से जोड़ने की जरूरतसाहित्य अकादेमी पुरस्कारों से उठते गंभीर प्रश्नचुनावी कवरेज की भी है लक्ष्मण रेखा!हिंदी के विरुद्ध ‘पवित्र जिहाद’पठनीयता के संकट के बीच खुद को बदल रहे हैं अखबारसमय के साथ बदला है हमारा मीडियाभारत को जानो, भारत को मानो!विज्ञापनों में भारतीयता के प्रणेता थे पीयूष पाण्डे

अब यहां से कहां जाएं हम

हिंदी पत्रकारिता दिवस (30 मई) की द्विशताब्दी के प्रसंग पर विशेष

अब यहां से कहां जाएं हम?

हिंदी पत्रकारिता की द्विशताब्दी (200 वर्ष)पर समारोहों की धूम है। दिल्ली, भोपाल, जयपुर, कोलकाता, रायपुर, कानपुर से लेकर अनेक शहरों और विश्वविद्यालयों के पत्रकारिता विभागों पर विमर्श व संवाद के अनेक आयोजन हो रहे हैं। जाहिर है हिंदी का गौरव और आत्मविश्वास दोनों बढ़ा है। उसकी लोकस्वीकृति बढ़ी है। वह भारत में मीडिया, मनोरंजन जगत और वोट मांगने की सबसे बड़ी भाषा है। हिंदी देश के ताकतवर प्रधानमंत्री से लेकर सामान्यजन तक की भाषा बन गयी है। राजनीतिक संचार की सबसे बड़ी भाषा वह पहले से थी किंतु नरेंद्र मोदी, अमित शाह और राजनाथ सिंह जैसे नेताओं की केंद्रीय उपस्थिति में वह सत्ता की भी भाषा बन गयी है। जाहिर है उसके मीडिया का भी अपना जलवा है। आज वह सत्ताधीशों की प्रिय भाषा है, जनभाषा तो वह पहले से थी।

क्या हमारी भाषा बचेगी?

द्विशताब्दी वर्ष का उत्सव मनाते हुए कई सवाल मथ रहे हैं। हिंदी प्रेमियों के सत्तारूढ़ होने, राजनीतिक परिवर्तनों के कारण हिंदी की ताकत सामने दिख रही है। किंतु हमें उन सवालों पर भी सोचना होगा जिससे हमारी पत्रकारिता और मीडिया को शक्ति मिलती है। पत्रकारिता को शक्ति देने वाली पहली ताकत है ‘भाषा’। क्या हमारी आनेवाली पीढ़ी हिंदी के साथ सहज है? वह पढ़ना, लिखना, समझना और बोलना हिंदी में कर रही है? उसकी शिक्षा का माध्यम क्या धीरे-धीरे अंग्रेजी नहीं हो गयी है? ऐसे कठिन समय में हिंदी और भारतीय भाषाओं के सामने अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की चुनौती है। हिंदी के पाठक ही न होंगें तो हिंदी के प्रिंट माध्यमों का भविष्य क्या है? इसी तरह हिंदी सुनी जाने वाली भाषा में बदल रही है। उसके गंभीर अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं और अन्य माध्यमों के सामने गहरा संकट है।

अकादमिक विमर्श की भाषा बनने की चुनौती-

हिंदी का उपयोग बड़ी मात्रा में मनोरंजन, राजनीतिक संचार या बाजार में ही हो रहा है। गंभीर अकादमिक विमर्श की भाषा बने बिना उसे लंबे समय तक टिकाए रखना कठिन होगा। जनसंचार की वह सबसे लोकप्रिय भाषा हो सकती है, किंतु ज्ञान-विज्ञान के हर अनुशासन की भाषा बने बिना उसे वह महत्व नहीं मिल सकता, जो दुनिया की ताकतवर भाषाओं को मिल रहा है। मीडिया लोकप्रिय को साधता है, सबसे संवाद करता है, मनोरंजन करता है, सूचना देता है। किंतु भाषा के अनेक रूप हैं जिनमें भाषा को साबित करना होता है। ऐसे में गंभीर प्रकाशनों की हालत अच्छी नहीं है। हिंदी विमर्श की नहीं, प्रचार की भाषा ज्यादा बन गयी है। जिस तरह के गंभीर अखबार और पत्रिकाएं आज भी कम पाठक संख्या के बावजूद अंग्रेजी भाषा के पास हैं, हिंदी के पास नहीं हैं। हिंदी वैचारिक दारिद्रय से जूझ रही भाषा है। जिसके पास गौरवशाली अतीत है, बहुत आत्मविश्वास है। किंतु गहराई कम हो रही है। हम लोकप्रियता को साधने वाली पत्रकारिता तक सीमित हो रहे हैं। जिसमें गंभीर अनुसंधान, माटी की सुगंध कम होती जा रही है।

कृत्रिम बुद्धिमता से जूझती भाषा-

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में जब भाषाएं तेजी से मशीनीकृत हो रही हैं। हिंदी अपना रुप, रस, गंध और आस्वाद गवां सकती है। तमाम माध्यमों की एआई पर बढ़ती निर्भरता भाषा के साथ खिलवाड़ जैसा ही है। एआई के मशीनी- तकनीकी इस्तेमालों से आगे जब एआई, भाषा की ओर बढ़ रही है तो उसकी सीमाएं बहुत स्पष्ठ हैं। भाषा का समाज में फलना-फूलना  और विकसित होना बहुत सहज और स्वाभाविक है। किंतु मशीनों द्वारा बन रही भाषा क्या रूप लेगी कहा नहीं जा सकता। सबसे बड़ी चिंता इसलिए भाषा की है क्योंकि भाषा ही नहीं बचेगी तो भाषा पर आधारित विधाएं जिनमें पत्रकारिता भी एक है कैसे बचेगी।

ऐसे कठिन समय में जब मीडिया में मूल्यबोध,भाषा की शुचिता के सवाल बेमानी लगने लगे हों, गंभीरता के साथ इस विधा में काम करनेवालों की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है। स्कूलों से लेकर पूरे अकादमिक जगत में हिंदी लगभग बहिष्कृत भाषा बन गयी है। आने वाले दिनों में क्या हिंदी सिर्फ बोलने की भाषा रह जाएगी जैसा वो पहले कभी थी। हमारे यशस्वी संपादकों बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बाबूराव विष्णु पराड़कर, सखाराम गणेश देउस्कर, माधवराव सप्रे जैसे नायकों की बदौलत आज हम यहां तक पहुंचे हैं। समाज में अलग-अलग तरह से बरती जा रही भाषा ने न सिर्फ अनुशासन और व्याकरण पाया बल्कि वह शानदार गद्य की भाषा बनी। हिंदी पत्रकारिता के संपादकों का यह योगदान हमें पता है कि कैसे उन्होंने एक शानदार भाषा हमें सौंपी। यह ऐसी भाषा बनी जो सिर्फ साहित्य की भाषा नहीं थी, समाज जीवन के विविध अनुशासनों को व्यक्त करने वाली भाषा थी। उसकी ताकत दिखने लगी। पत्रकारिता में छत्तीसगढ़ मित्र, सरस्वती, हंस, प्रभा, कल्पना जैसी पत्रिकाओं ने जो किया उसकी मिसाल खोजने पर नहीं मिलेगी। भाषा का आत्मविश्वास और सार्मथ्य हिंदी पत्रकारिता ने उसे अनुभव करवाया।

संकल्प से मिलेगी सिद्धि-

200 साल पूरे करने के बाद अब हमें कुछ संकल्प लेने ही चाहिए। पं. युगलकिशोर शुक्ल ने उदंत मार्त्तण्ड के रुप में जो दीप जलाया, उसे हमें प्रज्ज्वलित रखना है। यह कर्तव्य और उत्तराधिकार दोनों हमें मिला है। हम अपनी भाषा को कैसे बचाएं। कैसे उसे हर अनुशासन की भाषा बनाएं यह संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है। अकादमिक, प्रशासनिक, न्याय व्यवस्था, वित्त और व्यवसाय तक विविध क्षेत्रों में हिंदी का प्रभावी हस्तक्षेप अभी शेष है। हिंदी और भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता इसे मिलकर ही कर सकते हैं। इससे स्वत्व की पहचान होगी और भारतबोध प्रखर होगा। हमें अपने लोगों को न्याय दिलाना है तो यह उनकी अपनी भाषा में ही संभव है।

वैचारिक साम्राज्यवाद के मुक्ति इन्हीं प्रयासों से मिलेगी। यह सिर्फ भाषा प्रेम का सवाल नहीं, भारतप्रेम और सामाजिक न्याय का भी विषय है। अपनी भाषाओं में बोलता, पढ़ता, सुनता, सीखता भारत अभी भी प्रतीक्षित है। मीडिया की इसमें बड़ी भूमिका है। हमें पता है कि आज के युग में जिस तरह मीडिया का विस्तार हुआ है, भूगोल की सीमाएं डिजिटल मीडिया के नाते टूट गई हैं। उसमें जो श्रेष्ठ होगा वही टिकेगा। अपनी भाषा में हम श्रेष्ठतम सृजन करें। हिंदी को इतना ताकतवर बनाएं कि दुनिया के ज्ञान क्षेत्र में सक्रिय जन हमारी पत्रकारिता से संदर्भ ग्रहण करें। उधार और जूठन पर आधारित लेखन और पत्रकारिता का कोई मूल्य नहीं है, इसे हम जानते हैं। गंभीर रिपोर्टिंग और गंभीर विश्वेषण आज की जरुरत है। इससे ही हमें मौलिक सृजनकर्ता के रूप में स्वीकार किया जाएगा। भारत का विचार श्रेष्ठता का विचार है, विश्वमंगल का विचार है। हमारी पत्रकारिता अगर इसकी वाहक बन रही है तो यह बात हमारे संकल्पों और दृढ़ करेगी। 200 साल पूरे करने की बधाई देते हुए मीडिया जगत से यह आग्रह भी है कि वे हिंदी पत्रकारिता के ध्वज को गुणवत्ता के आधार पर और ऊंचा ले जाएंगें।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

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