
क्या एआई छीन लेगा हमारी भाषाओं की आत्मा
अब जब वह जमाना बीत रहा है जिसमें हम अपने पसंदीदा लेखकों को मुग्ध होकर पढ़ते थे, उनकी भाषा, उनकी शैली की दीवानगी हमें उनसे जोड़कर रखती थी। यह ऐसा रिश्ता था जो हमें किसी खास लेखक का पाठक बना देता था। क्या डिजिटल क्रांति के इस दौर में मशीनें जिस तरह लिख-पढ़ रही हैं, लेखकों का वजूद रह जाएगा? जनरेटिव एआई अब केवल तकनीकी टूल न रहकर भाषा, विचार और अभिव्यक्ति का माध्यम बन रही हैं, उससे चिंता की लकीरें गहरी हो गयी हैं। हमें आश्वासन दिए जा रहे हैं कि वे एक मशीनी भाषा लिखेंगीं, पर दिल कहां से लाएंगी? संवेदनाएं कहां से लाएंगीं? लेकिन दिमाग इस तरह से भी सोचता है कि अगर वे दिल और भावनाएं भी ला सकीं, हमारे आपके जैसा ही सोचने और लिखने लगीं तो क्या होगा?
हमारे लिए क्या छोड़ेंगी मशीनें?
बहुत कुछ तो एआई कर ही रहा है। सीखते हुए बड़ी और समझदार हो रही मशीनें क्या हमें लिखने लायक भी छोंडेंगी? मशीनों पर बढ़ती निर्भरता क्या हमें मौलिक चिंतन के लायक छोड़ेगी? ये बड़े सवाल हैं। एआई के अनेक टूल्स हिंदी और भारतीय भाषाओं में धाराप्रवाह लिख रहे हैं, कंटेट क्रिएट कर रहे हैं। यह हमारी भाषाई विविधता के लिए बड़ा अवसर है या भाषाई पहचान और भाषा से जुड़े व्यवसाय के लिए संकट के दिन, कहना कठिन है। माना जा रहा है कि ये प्रयोग डिजिटल खाइयों (डिजिटल डिवाइड) को कम करेंगें। अंग्रेजी न लिखने, बोलने और समझने वाले बड़े समाज के लिए बहुत कुछ पहुंच में आ जाएगा। वे सरकारी योजनाओं, सेवाओं, सूचनाओं को अपनी भाषा में ग्रहण कर सकेंगें। भारतीय भाषाओं का ‘रीयल टाइम अनुवाद’ हमारी भाषाई सद्भावना को बढ़ाने का काम करेगा। हमारा संपूर्ण भारतीय साहित्य और ज्ञान परंपरा सब भाषा भाषियों तक पहुंच सकेगा। इसी के साथ लुप्त हो रही बोलियां, संवाद और लोक परंपराएं और प्रदर्शन कलाएं संरक्षित किए जाने की पहल भी हो सकती है। डिजिटल आकार्इव हमें यह सुविधा देगा कि हम अपना बहुत कुछ बचा सकें और अपनी-अपनी भाषाओं में उसे सुन सकें, पढ़ सकें।
क्या रूप, रस, गंध खो बैठेंगीं भाषाएं?
सबसे बड़ा संकट है भाषाओं की आत्मा का। उसकी चिति का। उसके मुहावरों- लोकोक्तियों का। उसके नाद का। मशीनी अनुवाद,मशीनी लेखन से भाषाएं क्या अपना मूल रस,स्वाद,गंध और भाव खो बैठेंगी। क्या उन्हें संवेदना के तल पर रिक्त छोड़ दिया जाएगा। क्या भाषाएं अब सूचना की वाहक तो होंगीं किंतु भावों का निर्वहन करने लायक नहीं बचेंगीं? हमारे एआई माडल्स मूलतः पश्चिमी या अंग्रेजी डेटासेट पर प्रशिक्षित हैं। वे भारतीय भाषाओं का सुंदर अनुवाद कर रहे हैं। लेकिन उसमें प्रयुक्त मुहावरों, लोकोक्तियों, मानवीय संस्पर्श की कोमल भावनाओं, व्यंग्य और भावनात्मक गहराई को छू नहीं पा रहे हैं। संभावना है कि वे भविष्य में इन्हें छूने और पकड़ने का प्रयास करें।
भाषाई समरूपता कई बार भाषा प्रवाह में ही बाधा बनती है। मशीनी अनुवाद की सीमाएं भी जाहिर ही हैं। इनके कारण लेखन में मशीनीपन और भाषा में भाव की कमी साफ दिखती है। भारतीय भाषाओं की डेटा आज भी बहुत कम है। वे समाज में गहरी पैठी हुई भाषाएं तो हैं किंतु डिजिटल दुनिया में उनकी उपस्थिति अभी सीमित है। ऐसे में स्थानीय डेटासेट बड़ी संभावनाओं के द्वार खोलता है। भारतीय भाषाओं के लिए स्वदेशी टूल्स (एलएलएम्स) का विकास जरुरी है, जिससे हमारी भाषाएं भी अपने सामर्थ्य का प्रदर्शन यहां कर सकें। इससे हमारी संस्कृति, हमारी वाक् परंपरा और व्याकरण का संरक्षण भी होगा। सभी कहते हैं कि एआई को सहायक के रुप में देखें न कि लेखक के रूप में। लेकिन एआई पर बढ़ती निर्भरता क्या लेखक के विचारों और उसकी चिंतन प्रक्रिया को अनुकूलित नहीं करेगी? वह उन्हीं विषयों, विचारों और दायरों में कैद होकर रह जाएगा जहां एआई उसे ले जाएगी। स्वतंत्र चिंतन के लिए एआई का प्रयोग कितना उपयोगी है, यह सोचने की जरुरत है। आज हमारे पास कोई नीतिगत ढांचा और नैतिक निर्देश नहीं हैं। ऐसे में हम अपनी हदों और सरहदों को कैसे तय करें?
संस्कृति की वाहक है भाषा-
इसमें दो राय नहीं कि एआई के पास भाषा आ चुकी है। वह उसे लिखना, बोलना और व्यक्त करना जानता है। कई बार उसकी भाषा परिशुद्ध भी होती है, गलतियों के बिना और व्याकरणपरक भी। बावजूद इसके उसके मशीनीकृत रूप के भी कई रूप रचे जा सकते हैं। वह अनेक शैलियों में पारंगत हो रहा है। अनुवाद कुशल तो वह है ही। ऐसे में भाषा की आत्मा का क्या होगा, यह प्रश्न ज्यों का त्यों सामने खड़ा है। भाषा अकेली नहीं आती, वह किसी संस्कृति की वाहक होती है। स्थानीयता की भी वाहक होती है। संवेदना, विचार, संस्कृति और स्थानीय तत्वों से मिलकर भाषा अपने मुहावरे में ही मुक्ति पाती है। इससे उसकी दुनिया बड़ी होती है। उसका पाठक संसार खड़ा होता है। भारतीय भाषाओं के सामने सबसे बड़ा संकट यही है क्या वे अपनी मूल चेतना और रस-गंध को खो बैठेंगीं? वे सूचनाएं देंगी पर पर कुछ कहेंगीं नहीं। बतियाएंगी नहीं। उनमें बातें कहने की क्षमता हो सकती है पर वे संवाद नहीं कर पाएंगी।
सूचना का सुपर हाइवे मौलिकता की बलि न ले-
तकनीक की तेज रफ्तार के बीच में हमें भाषाई मौलिकता,मानवीय संस्पर्श को बचाए और बनाए रखने के सचेतन प्रयास करने होगें। डिजिटल क्रांति से भाषाओं का विस्तार तो हो किंतु उनकी मूल संवेदना, मुहावरे, लोकोक्तियां और संस्कृति न छूटें इसका प्रयास हम भाषाप्रेमियों को ही करना होगा। भाषाई दीवारें गिराने पर आमादा एआई हमारे लिए एक अवसर है, किंतु यह अवसर आत्मसमर्पण का कारण नहीं बने, इसके लिए हमें सोचना होगा। शब्द इंसान के हों किंतु भाषा मशीनी हो ऐसा तो हममें से कोई नहीं चाहेगा। सूचना का यह सुपर हाइवे हमारी मौलिकता की बलि न ले ले, इसकी जिम्मेदारी हर उस व्यक्ति की है जो अपनी भाषा से प्यार करता है।
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग में आचार्य और अध्यक्ष हैं। भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी), दिल्ली के महानिदेशक रह चुके हैं। 32 पुस्तकों का लेखन और संपादन किया है।
