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कला-संस्कृति से जुड़ी संस्थाओं का हो पुनर्गठन
रचनात्मक स्वतंत्रकता के नाम पर बेईमानी
फिल्मों से निकलते संदेश और हमारा समाज
मीडिया में दिख रहा है किस औरत का चेहरा!
भारतीय उच्चादर्शों को स्थापित करने वाले नायक हैं राम
जनसंचार शिक्षा को सरोकारों से जोड़ने की जरूरत
साहित्य अकादेमी पुरस्कारों से उठते गंभीर प्रश्न
चुनावी कवरेज की भी है लक्ष्मण रेखा!
हिंदी के विरुद्ध ‘पवित्र जिहाद’
पठनीयता के संकट के बीच खुद को बदल रहे हैं अखबार
समय के साथ बदला है हमारा मीडिया
भारत को जानो, भारत को मानो!
विज्ञापनों में भारतीयता के प्रणेता थे पीयूष पाण्डे
गाँधी के राम
हिन्दी पत्रकारिता की आगामी दिशा
तय हों मीडिया कवरेज की हदें और सरहदें
जाति, बाहुबल के बीच विकसित बिहार के सपने!
संपादक के विस्थापन का कठिन समय!
विचारधारा थोपना यानि घोड़े की पीठ पर मेढ़क लादना
पत्रकारिता के नए अध्याय गढ़ने का समय
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July September 2017
By
Professor Sanjay Dwivedi
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