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युवा शक्ति के जागरण से ही बनेगा समर्थ भारत

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मनोरंजन और करियर से आगे भी सोचें नौजवान

भारत इस अर्थ में गौरवशाली है कि वह एक युवा देश है। युवाओं की संख्या के हिसाब से भी, अपने सामर्थ्य और चैतन्य के आधार पर भी भारत पूरी दुनिया में एक विशिष्ट स्थान रखता है। भारत एक ऐसा अनूठा देश है, जिसके सारे नायक युवा हैं। हमारे गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक चेतना के केंद्र श्रीराम, श्रीकृष्ण, जगदगुरू शंकराचार्य और आधुनिक युग के नायक स्वामी विवेकानंद तक सभी युवा नायक रहे हैं। युवा कोई केवल शारीरिक आयु नहीं है, युवा वास्तव में एक विराट चेतना है, जिसमें अपार ऊर्जा बसती है, गहरा भरोसा बसता है, अडिग विश्वास बसता है, सुंदर सपने पलते हैं और नई आकांक्षाएं लगातार धड़कती हैं। इसलिए युवा होना भारत को बेहद रास आता है।

भारत के सारे भगवान युवा हैं। वे कभी बुजुर्ग नहीं होते, वे सदैव शाश्वत युवा रहते हैं। यही युवा चेतना और ऊर्जा भारत की जीवंतता का मुख्य आधार है। आज जबकि दुनिया के तमाम देशों में युवा शक्ति का भारी अभाव दिखता है, भारत का चेहरा उनमें बिल्कुल अलग और ओजस्वी दिखाई देता है।  छात्र होना यदि निरंतर सीखना और ज्ञान अर्जित करना है, तो युवा होना अपने कर्म को पूजा मानकर पूरी लगन से राष्ट्र निर्माण में जुट जाना है। एक सीख है, तो दूसरा प्रचंड कर्म है। सीखी गई हर चीज को हमारे युवा ही परिणाम देते हैं और उसे धरातल पर साकार करते हैं। ऐसे में भारत की इस विराट छात्र शक्ति को सीखने के बेहतर और पारदर्शी अवसर देना,उनकी अंतर्निहित प्रतिभा के उन्नयन के लिए नए अनंत आकाश उपलब्ध कराना, हमारे समाज और चुनी हुई सरकारों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। यदि हमारे छात्र को छात्र जीवन में ठीक से गढ़ा नहीं जाएगा, तो वह आगे चलकर एक आदर्श और जिम्मेदार नागरिक कैसे बनेगा?

देश के प्रति अपनी मौलिक जिम्मेदारियों का निर्वहन वह किस प्रकार करेगा? भारत के शिक्षा परिसर ही नए भारत के निर्माण की असली आधारशिला हैं, अतः उनका वैचारिक रूप से जीवंत होना और निरंतर सक्रिय रहना बेहद जरूरी है। अराजनैतिक छात्र शक्ति का निर्माण आज हमारे समाज की एक बड़ी विडंबना बन चुकी है। देश में पूरी तरह से एक ऐसा कृत्रिम वातावरण बनाया जा रहा है जिसमें छात्र सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोचे, अपने व्यक्तिगत करियर और पैकेज के बारे में सोचे। उसमें सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों, राष्ट्र के प्रति गहरे सद्भाव और संवेदनशीलता कैसे पैदा हो, इस ओर गंभीर प्रयास आज बहुत जरूरी हैं। यह अत्यंत आवश्यक है कि वे अपने देश के बारे में गहराई से जानें, उसकी विविधताओं और बहुलताओं का सम्मान करें, तथा ऐसे प्रबुद्ध नागरिक बनें जो विश्वमंच पर भारत की मान-प्रतिष्ठा को बढ़ा सकें। अतीत में तमाम सामाजिक संगठनों से जुड़कर हमारी छात्र-युवा शक्ति अनेक प्रकार के सामाजिक और रचनात्मक प्रकल्पों को चलाती भी रही है। किंतु दुर्भाग्यवश, हमारी वर्तमान औपचारिक शिक्षा व्यवस्था में ऐसी कोई जीवंत व्यवस्था पूरी तरह नदारद दिखाई देती है। आज ऐसा महसूस होता है कि वर्तमान शिक्षा से हमारे युवा जो कुछ भी प्राप्त कर रहे हैं, उससे वे संवेदनशील मनुष्य कम और संवेदनहीन मशीन ज्यादा बन रहे हैं। वे कॉरपोरेट जगत के लिए काम के लोग तो बनते हैं, किंतु नागरिक और राष्ट्रीय चेतना से लैस संपूर्ण मनुष्य नहीं बन पाते हैं।

छात्रों और युवाओं में राष्ट्रीय चेतना किसी भी सामान्य व्यक्ति की तुलना में  बहुत ज्यादा और प्रखर होती है। इसलिए यदि हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था में ही राष्ट्रीय भाव और सामाजिक मूल्य समाहित होते, तो आज देश के हालात बिल्कुल अलग और बेहतर होते। हालात यह हैं कि जो छात्र और युवा व्यक्तिगत रूप से सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से नहीं जुड़े हैं, उनकी राष्ट्रीय विषयों पर कोई स्पष्ट सोच या राय नहीं बन पाती है, क्योंकि उन्हें इस दिशा में सोचने और खुलकर काम करने का अवसर ही नहीं मिलता। इस प्रकार हमने अनजाने में या किसी सुनियोजित व्यवस्था के तहत छात्र-युवाओं को पूरी तरह अराजनैतिक और नितांत व्यक्तिगत सोच वाला बना दिया है। आज का मुख्यधारा का छात्र-युवा केवल तात्कालिक आनंद और बाहरी उत्सवों में मस्त है। वह लेट-नाइट पार्टियों, सोशल मीडिया के आभासी संसार और मस्त माहौल को ही अपना सर्वस्व समझ रहा है। ऐसी गंभीर स्थितियों में यह बेहद जरूरी है कि छात्रों का स्वस्थ राजनीतिकरण हो, उन्हें एक मजबूत वैचारिक आधार से लैस किया जाए, और देश के बुनियादी प्रश्नों पर वे खुलकर परिसरों में संवाद करें। आज देश के तमाम बड़े शिक्षा परिसरों  में छात्रसंघ चुनाव भी नहीं कराए जाते। आखिर एक लोकतांत्रिक देश में छात्रों के राजनीतिकरण और उनकी वैचारिक प्रखरता से किसे डर लगता है? सच तो यह है कि सत्ताएं हमेशा चाहती हैं कि युवा मस्त-मस्त जीवन जीते रहें, और समाज में खड़े बुनियादी सवालों से कभी न टकराएं। वे पार्टियों में झूमते रहें और फौरी मनोरंजन ही उनके जीवन का आधार बना रहे।

मनोरंजन और सिर्फ अपने करियर से आगे सोचने वाली युवा शक्ति का अभाव आज हमारे समय की सबसे बड़ी और गंभीर चुनौती है। आवश्यकता आज इस बात की है कि हमारे शिक्षा परिसरों को ज्यादा जीवंत, उत्तरदायी और प्रासंगिक बनाया जाए। हमारे परिसरों को सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक प्रश्नों पर विमर्श और प्रशिक्षण का मुख्य केंद्र बनाया जाए।अगर हमारे परिसर जीवंत होंगे, तो उनसे निकलने वाला नया समाज भी उतना ही जीवंत और जागरूक बनेगा। भारतीय परंपरा में संवाद और विवाद की अनंत धाराएं रही हैं। यह समाज मूलतः एक संवादित समाज है। जिन दिनों संचार के आधुनिक साधन उपलब्ध नहीं थे, तो भी हमारा समाज उतना ही संवादित और वैचारिक रूप से सक्रिय था। कुंभ के विशाल आयोजनों से लेकर अनेक मेलों में समाज आपस में संवाद करता था और महत्वपूर्ण विषयों पर मंथन करता था। नए समय ने समाज के इस आपसी संवाद के अनेक मार्ग बंद कर दिए हैं। सामयिक प्रश्नों पर संवाद बेहद कम होने के कारण नई पीढ़ी को देश की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक चुनौतियों से रू-ब-रू होने का अवसर ही नहीं मिलता। इसलिए देश के युवा आज अपने समय की वास्तविक चुनौतियों को नहीं पहचान पा रहे हैं।

युवाओं को एक ऐसा रोबोटिक युवा बनाया जा रहा है जो करियर और मनोरंजन से आगे कभी न सोच सके। इस प्रकार सामाजिक सोच का स्वाभाविक विकास पूरी तरह बाधित हो रहा है। ऐसे में देश के छात्र संगठनों को अपनी बड़ी जिम्मेदारी निभानी होगी। छात्र संगठनों की यह जिम्मेदारी है कि वे राजनीतिक दलों के पिछलग्गू बनने के बजाय अपने संकुचित दायरे से बाहर आएं। आज जहां व्यावसायिकता के कारण शिक्षा और शिक्षक छात्रों का साथ छोड़ रहे हैं, छात्र संगठनों को वहीं पर छात्रों का साथ पकड़ना होगा। छात्र संघों को छात्रों की सर्वांगीण प्रतिभा के उन्नयन का मार्ग प्रशस्त करना होगा। छात्र संघ अपनी भूमिका का विस्तार करते हुए सिर्फ छात्र समस्याओं और संकीर्ण राजनीतिक कामों के बजाय देश के बड़े सवालों पर सोचने और उन पर निरंतर विमर्श का कार्य भी कर सकते हैं। छात्र शक्ति की सक्रिय और जागरूक भागीदारी से देश में आमूल-चूल परिवर्तन आ सकता है। एक बार राष्ट्र कल्याण का मिशन और ध्येय पैदा होते ही छात्र एक ऐसी अपराजेय युवा शक्ति में परिवर्तित हो जाता है, जिससे देश का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित होता है। आज देश के सभी क्षेत्रों में रचनात्मक जन-आंदोलन कमजोर हुए हैं। इन आंदोलनों के कमजोर होने के कारण विविध क्षेत्रों की वास्तविक और शोषित आवाजें नीति-निर्धारकों तक सुनाई देनी बंद हो गई हैं। इसके चलते सत्ताओं का अतिरेक और आत्मविश्वास अनियंत्रित रूप से बढ़ रहा है। जनसंगठन और छात्र संगठन एक सामाजिक दंड शक्ति के रूप में काम करें,इसके लिए उन्हें पूरी सजगता के साथ सचेतन प्रयास करने होंगे। इससे सत्ता और प्रशासन को भी सामाजिक शक्ति और जनभावना का विचार करना पड़ता है।

लोकतंत्र में नागरिकों की सक्रिय भागीदारी ही उसे सफल और सार्थक बनाती है। अगर नागरिक जागरूक नहीं होते, तो उनको उसके भयंकर परिणाम भोगने पड़ते हैं। एक सोया हुआ समाज कभी भी न्याय प्राप्ति की उम्मीद नहीं कर सकता। एक जागृत समाज ही अपने हितों की रक्षा करता हुआ अपने राष्ट्र की चौमुखी प्रगति में अपना अमूल्य योगदान देता है। अगर छात्रों में छात्र जीवन से ही ये राष्ट्रीय मूल्य स्थापित कर दिए जाएं, तो वे आगे चलकर देश के एक सक्रिय और ईमानदार नागरिक बनेंगे, इसमें कोई दो राय नहीं है। उन्हें अपनी जड़ों से गहरा प्रेम होगा, अपनी संस्कृति से प्रेम होगा, अपने समाज और उसके लोगों से सच्चा प्यार होगा। वह कभी किसी से नफरत नहीं कर पाएगा, क्योंकि उसके मन में राष्ट्रीय भावना का प्रवेश हो चुका होगा। वह राष्ट्र को सदैव सर्वोपरि मानेगा और राष्ट्र के सभी नागरिकों को अपना भाई- बंधु समझेगा। वह जानेगा कि उसके द्वारा किए गए हर कार्य का क्या सामाजिक परिणाम है। उसे बखूबी पता होगा कि देश के समक्ष उपस्थित विभिन्न चुनौतियों का सामना उसे किस तरह करना है। देश के छात्र संगठन अपनी-अपनी विचारधाराओं और राजनीतिक धाराओं को मजबूत करते हुए भी का यह पावन भाव अपने संपर्क में आने वाले हर युवा में भर सकते हैं। सही मायने में यही जागरूक युवा आगे चलकर एक समर्थ, आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करेंगें।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

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