ज्ञान-भारतम से बदलेगा इतिहास का लैंडस्केपअब यहां से कहां जाएं हमस्तरीय शोध-प्रकाशन को कैसे लगे पंखहिंदी पत्रकारिताः सबक 200 साल केभारतीय भाषाओं के वैश्विक पहचान की पहलमहात्मा फुले शताब्दी की समिति में साहित्यकार नीरजा माधव मनोनीतपत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं का हस्तांतरण नहीं न्याय की पक्षधरता हैकला-संस्कृति से जुड़ी संस्थाओं का हो पुनर्गठनरचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर बेईमानीफिल्मों से निकलते संदेश और हमारा समाजमीडिया में दिख रहा है किस औरत का चेहरा!भारतीय उच्चादर्शों को स्थापित करने वाले नायक हैं रामजनसंचार शिक्षा को सरोकारों से जोड़ने की जरूरतसाहित्य अकादेमी पुरस्कारों से उठते गंभीर प्रश्नचुनावी कवरेज की भी है लक्ष्मण रेखा!हिंदी के विरुद्ध ‘पवित्र जिहाद’पठनीयता के संकट के बीच खुद को बदल रहे हैं अखबारसमय के साथ बदला है हमारा मीडियाभारत को जानो, भारत को मानो!विज्ञापनों में भारतीयता के प्रणेता थे पीयूष पाण्डे

हिंदी पत्रकारिताः सबक 200 साल के

विकसित भारत का मंत्र है-“हिंदुस्तानियों के हित के हेत”

हिंदी पत्रकारिता के 200 साल का जश्न मनाते हुए हमें यह विचार भी करना चाहिए कि आखिर हम कहां आ गए हैं। 30 मई,1826 को पं.युगुलकिशोर शुक्ल ने ‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत’ का मंत्रघोष करते हुए अपना जब अपना पत्र ‘उदंत मार्तण्ड’ निकाला था तो दिन चुना था नारद जयंती का। लेकिन अपने गहरे मूल्यबोध, भाषा प्रेम के बावजूद वे उसे चला नहीं पाए। यह पहले अखबार की त्रासदी थी, किंतु वह शुरूआत थी। जिसने हिंदी को आत्मविश्वास दिया कि इस भाषा में भी अखबार निकाले जा सकते हैं। इसके पहले अंग्रेजी, बंगाली, फारसी के अखबार तो कोलकाता से निकल ही रहे थे। इन सबके बीच हिंदी ने भी अपनी जगह बनाई। इसलिए ‘उदंत मार्तण्ड’ के प्रकाशन के बाद की 200 सालों की यात्रा हिंदी पत्रकारिता के आत्मविश्वास, मूल्यचेतना और देश का प्रखर स्वर बन जाने की यात्रा भी है।

आज हिंदी और भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता देश का मुख्य स्वर है। अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुए देश ने अपनी भारतीय भाषाओं में लिखना, बोलना,पढ़ना और सुनना प्रारंभ किया। हिंदी और भारतीय भाषाओं का मीडिया अपनी लोकप्रियता में अग्रणी है। अंग्रेजी मीडिया की इससे कोई तुलना नहीं हो सकती। प्रभाव, गुणवत्ता और पहुंच सभी मामलों में आज भारतीय भाषाओं का मीडिया इस देश की आकांक्षाओं, सपनों,संघर्ष, जनांदोलनों और आर्तनाद को आवाज देने वाला मीडिया बन चुका है। देश के जनसामान्य के सपनों और उम्मीदों का अक्स भारतीय भाषाओं की मीडिया में दिखता है। गांव-गांव तक पहुंचे अखबारों ने एक अलग प्रकार का सशक्तीकरण किया है। रेडियो ने राहत दी है तो टीवी उन्हें देश के चेहरे दिखाता है। अब डिजीटल माध्यमों से लोकभाषाएं भी प्रवास कर रही हैं। दुनिया भर में हमारी भाषाएं ही नहीं, बोलियां भी सुनी, देखी जा रही हैं। ‘यू-ट्यूब’ ने भारत के ‘स्व’ को वैश्विक आधार दिया है। अपनी संस्कृति से,भाषा से, प्रदर्शन कलाओं से, खानपान, रीति-रिवाज से जुड़े रहना अब आसान है। यू-ट्यूब पर अनेक लोग आपको इन विधाओं से जोड़ते हैं, भले ही आप दुनिया के वृत्त में कहीं भी बसे हों।

लोकप्रियता और सार्थकता के द्वंद-

आज बहस यहां आकर टिक गयी है कि लोकप्रियता और सार्थकता में किसे चुना जाए। प्रिंट मीडिया में तो बहुत कुछ आज भी संभला हुआ है किंतु डिजिटल माध्यमों में लोकप्रिय होने और लाइक्स की होड़ के कारण बहुत कुछ गड़बड़ भी हो रहा है। कंटेट की शुचिता सवालों के घेरे में है। फेक न्यूज, हेट न्यूज, अश्लीलता का बाजार सब कुछ यहां है। ठग, सलाहकार, मनोविकारी, अपराधी और पाखंडी भी यहां अपना व्यापार चला रहे हैं। लोगों को धोखा दे रहे हैं। कंटेट के इस बाजार में सब कुछ ‘अमृत’ नहीं है, यहां ‘जहर’ भी है और मनोविकार भी। इसलिए मीडिया की व्यापकता ने परंपरागत मीडिया प्रतिष्ठानों को हैरत में डाल दिया है। अनेक कथित विचार नायक उभरकर आए हैं। यू-ट्यूबर नाम की नई प्रजाति भी दिखती है। उसमें अनेक बहुत अच्छा काम कर रहे हैं तो बड़ी मात्रा में मनोविकारों के प्रचारकर्ता भी हैं। इस कठिन समय में मीडिया के पारंपरिक अधिष्ठान पर कार्य करने वालों के सामने खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की बड़ी चुनौती है। नए माध्यमों पर अवतरित योद्धा कुछ भी कह रहे हैं और देश उन्हें सुन रहा है। ऐसे में किया क्या जाए।

पठनीयता का संकट और डिजिटल का जश्न-

पत्रकारिता के 200 साल का जश्न मनाते समय हमें सबसे बड़ी चिंता प्रिंट माध्यमों की पठनीयता की है। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं,किताबों की पठनीयता गहरे संकट में है। मोबाइल माध्यमों पर जाते युवा अब शायद ही अखबार पढ़ते हों। जहां अखबार जा रहे हैं वहां भी वे पलटे भी जा रहे हों, तो बड़ी बात है। इसका आभास आपको गायब होते बुक स्टालों से होगा। पहले बुक स्टाल पत्र-पत्रिकाओं से गुलजार रहा करते थे। आज उनकी संख्या कम दिखती है। एचए व्हीलर,सर्वोदय के बुक स्टाल रेलवे स्टेशनों पर आकर्षण का केंद्र थे, आज उन स्टालों पर किताबें कम खाद्य सामग्री ज्यादा बिक रही है। एयरपोर्ट्स पर कुछ सजीले बुक स्टाल्स दिखेंगें जहां से हिंदी और भारतीय भाषाओं का साहित्य नदारद दिखेगा। पत्र- पत्रिकाओं की तो जाने दीजिए।

कायम है छपे हुए शब्दों पर भरोसा-

देश की बड़ी आबादी का भरोसा छपे हुए शब्दों पर आज भी कायम है। यह भरोसा ही इस देश के प्रिंट मीडिया की शक्ति है। इससे ही प्रिंट मीडिया अपने को बनाए और बचाए हुए है। इसके साथ ही उनके ई-पेपर और पोर्टल पर जा रहे युवा और अन्य पाठक बताते हैं कि बदलते माध्यमों के साथ भी वे अपने अखबार या मैगजीन से जुड़े हुए हैं। इसका एक लाभ यह भी है कि हमारी पत्र-पत्रिकाओं का भूगोल अब वैश्विक है। एक अखबार को छापकर आप कहां तक पहुंचा सकते हैं, किंतु उसके ई-पेपर को पूरी दुनिया में देखा जा सकता है। यह विस्तार भी नए तरीके से माध्यमों को लाभ पहुंचा रहा है। पहले मुफ्त में आनलाईन पढ़ने की सुविधा से अलग अब कुछ मीडिया समूह पाठकों से धन अर्जित करने लगे हैं। वह आनलाइन मेंबरशिप के तौर भी है। गूगल के विज्ञापनों से भी। केंद्र और राज्य सरकारें भी अब लाइनलाईन मीडिया को विज्ञापन देने लगी हैं। यह एक नया बदलाव है, जिसे समझा जाना चाहिए। हमें यह समझना होगा कि मोबाइल अब सामग्री ग्रहण करने का मुख्य पटल बन गया है। ऐसे में अपने माध्यमों को न सिर्फ मोबाइल के लायक बनना होगा बल्कि यहां उपलब्ध भी होना होगा। ऐसा करके अनेक मीडिया प्रतिष्ठानों ने खासी पाठक और दर्शक संख्या पाई है, जो उनके प्रिंट संस्करण कभी नहीं पा सकते थे।

नहीं पढ़ सकते, सुनिए जनाब-

नए समय में मीडिया ने तकनीक की सवारी कर ली है। इसके कई लाभ भी हैं। किसी भी मीडिया को अब किसी भी भाषा में पढ़ने की सुविधा इसके विस्तार का बड़ा कारण बन रही है। टेक्ट्स का संकट भी खत्म होता दिख रहा है, जब आप लिपि न आने के कारण कुछ पढ़ न सकें तो उसे सुन सकते हैं। इसी के चलते किताबों को,अखबारों मे छपी खबरों को सुना जा रहा है। बहुत समय तक अपने माध्यमों पर रोमन में खबरें पढ़ते थे, आज देवनागरी लिपि न आने के बाद भी अगर भाषा की समझ है तो हिंदी को सुनकर समझ सकते हैं। यह एक तरह की क्रांति ही है। नित नई सुविधाएं शायद लिपि, भाषा की सीमाएं तोड़कर एक नई दुनिया रचें। जिसमें आप अपनी सामग्री अपनी भाषा में सुन सकते हैं। निरंतर विकसित होते एआई टूल्स इसे संभव करने में लगे हैं।

क्या हों हमारे संकल्प-

इस पूरे परिदृश्य में हमें तकनीक ने बहुत सी सुविधाएं दी हैं। अब जरूरत इस बात की है कि हम अपनी भाषाओं को श्रेष्ठ ज्ञान, सूचनाओं का केंद्र बनाएं। अब बाजार में वही टिकेगा जिसके पास श्रेष्ठ होगा। जाहिर है हमें अपने माध्यमों को कंटेंट की दृष्टि से सबल और सार्थक बनाना होगा। हमारे पास दुनिया को देने के लिए भारत का विचार है। शांति, सद्भाव का विचार है। संवाद से संकटों का हल करने का लंबा अभ्यास है। भारतीय पत्रकारिता आज वैश्विक मंच पर भी स्थान बना चुकी है। वह दुनिया की खास आवाज है। इसे जनसरोकारों से आगे जाकर लोकमंगल और विश्वमंगल के लक्ष्य से भी जुड़ना होगा। सिर्फ समस्याओं को उठाने वाली पत्रकारिता से आगे समाधान को भी प्रस्तुत करने वाला मीडिया अभी प्रतीक्षित है। “हिंदुस्तानियों के हित के हेत” का हिंदी के प्रथम संपादक का संकल्प हमारा भी संकल्प बने। यह संकल्प ही विकसित भारत का ध्येयमंत्र बन सकता है। भारतीय पत्रकारिता अपने उजले अतीत से प्रेरणा लेकर नया भारत बनाने के मिशन को पूरा करेगी इसमें संशय नहीं है।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

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