
भारतीय संस्कृति अपने नायकों, प्रतीकों और उनकी कथाओं से जीवन रस लेकर ही आजतक प्राणवान है। जीवंत है। उसके नायक चिरयुवा हैं और संकटों से जूझकर सुंदर दुनिया बनाने की आकांक्षा से भरे-पूरे हैं। राम, कृष्ण, शिव, गणेश और ऐसे न जाने कितने देव हमें प्रेरित करते हैं। सबका जीवन सरल नहीं है। सब जूझते हैं और समाधान पाते हैं। आदर पाते हैं। लोकमंगल ही सबका ध्येय है। इन सबमें श्री गणेश की महिमा सबसे अलग है। गणेश चतुर्थी के प्रसंग पर उनकी पूजा के साथ यह जानना जरूरी है कि आखिर उनमें ऐसा क्या खास है जो उन्हें सबसे अलग बनाता है। वे असाधारण संचारकर्ता और कुशल प्रबंधक की तरह हमारे सामने आते हैं।
सुनते हैं सब कुछ ध्यान से-
गणेश जी के बड़े कान इस बात की गवाही हैं कि वे हर बात को ध्यान से सुनते हैं। सुनना एक साधना है। ध्यान से सुनना उससे बड़ी साधना है। उन्होंने श्रवण कौशल को साध लिया है। दूसरों को ध्यान से सुने बिना न आप समझ सकते हैं न ही उचित निदान तक पहुंच सकते हैं। फैसले लेने हों या न लेने हों, सुनना तो पड़ेगा। गणेश जी ने इसे साध लिया है। इसलिए उन्हें विध्नहर्ता कहा गया, वे सुनकर हमारी समस्याओं का हल करने की क्षमता से लैस हैं।
बारीक नजर और दूरदर्शी नजरिया-
नजर से ही नजरिया बनता है। आंखें सबके पास होती हैं किंतु दृष्टि सबके पास नहीं होती। सूक्ष्म विश्लेषण का गुण ऐसे ही अर्जित नहीं होता। संकट या सामान्य दिनों में भी बारीक और पैनी नजर रखना व्यक्ति का विलक्षण गुण है। गणेश जी इसी गुण से समादृत हुए। उनकी छोटी आंखें पैनी नजर और तीक्ष्ण एकाग्रता का प्रतीक हैं। वे किसी भी संकट का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं।
परिस्थितियों के अनुसार आचरण-
श्री गणेश समय के साथ चलते हैं। मौके पर वे अनुकूलन कर लेते हैं और लचीलापन उनका स्वभाव है। कलाकारों को देखिए वे उनकी कितनी तरह की प्रतिमाएं बनाते हैं। उनका व्यक्तित्व ऐसा है कि उनमें प्रयोग संभव है। उनकी लचीली सूंड यह बताती है कि एक अच्छा कम्युनिकेटर (संचारक) कभी भी अपने रवैये में कठोर नहीं होता। लचीलापन, स्वीकार्यता और समावेशिता उसका मूल गुण है। समय और वातावरण को पहचान कर आचरण ही एक सफल संचारक की पहचान होती है। लोगों को प्रभावित करने में वे इसीलिए सफल होते हैं। आप देखें तो गणेश जी सकारात्मक संचार करते हैं। उनकी सर्वाधिक प्रतिमाएं इसलिए भेंट की जाती हैं, क्योंकि वे शुभ और सकारात्मकता का संचार करती हैं।
सीमित संसाधनों से बनाएं बेहतर जिंदगी-
कम से कम संसाधनों के उपयोग से वे बेहतर जिंदगी का पाठ पढ़ाते हैं। उनके माता-पिता पूज्य शिव और मां पार्वती उनके सामने ब्रम्हांड का चक्कर लगाने की शर्त रखते हैं तो कार्तिक अपने तेज वाहन मयूर से तत्काल यात्रा पर निकल जाते हैं। किंतु श्रीगणेश अपनी अप्रतिम बुद्धिमत्ता और सीमित संसाधनों के प्रयोग के संकल्प पर कायम रहते हुए अपने वाहन मूषक (चूहा) की सीमाओं को भी समझते हुए ‘आउट आफ बाक्स’ निर्णय लेते हैं। वे अपने माता-पिता की परिक्रमा करके ही स्मार्ट वर्क और रिसोर्स मैनेजमेंट का उदाहरण देते हैं। ऐसे कौशल ने उन्हें अप्रतिम बना दिया।
रुकना नहीं, चैरेवेति-चैरेवेति-
वे रुकना नहीं जानते, निरंतर काम पर हैं। बाधाएं आती हैं तो आएं , इससे वे प्रभावित नहीं होते। महाभारत लिखने की कथा को आप याद करें। उस समय महर्षि वेदव्यास तेज गति से बोल रहे थे। गणेश जी उनके सहयोगी लेखक हैं। उनकी लेखनी (कलम) टूट जाती है। वे पल भर का समय नहीं देखते। तत्काल अपना एक दांत तोड़कर लिखना प्रारंभ कर देते हैं। इसलिए उनको ‘एकदंत’ के रूप में भी पूजा जाता है। अपनी समय सीमा में रहते हुए काम को वक्त पर पूरा करना ऐसी ही प्रतिबद्धता है, जिसके वे उदाहरण बने। अपने ऐसे प्रबंधकीय और लेखकीय गुणों से उन्होंने मानवता की सेवा की।
जमीन से जुड़े नायक –
वे सब करते हैं। सब जानते हैं। संकटों के समाधान का रास्ता बताने वाले हैं किंतु सबके प्रिय गणेश जी कभी भी अपनी जमीन छोड़ते। पद और ज्ञान का अहंकार उन्हें छू तक नहीं गया है। वे जो हैं वह होना कठिन है। उनका विशाल शरीर है, वे असीम बुद्धिमत्ता से भरे हैं। इसके बाद भी वे छोटे से वाहन मूषक पर चल रहे हैं। आज जरा सी पद- प्रसिद्धि पाते ही लोग बड़े वाहनों पर चलने लगते हैं। हवाई यात्राओं में ही उनका जीवन और समय बीतता है। गणेश जी के पास सब कुछ हैं। लक्ष्मी साथ ही विराजमान हैं, किंतु वे अपने पुराने वाहन और पुराने सहयोगियों को नहीं भूलते। अहंकार उनके आसपास भी नहीं है। लोगों का मंगल करते हुए, लोगों के कष्ट दूर करते हुए वे सतत् प्रवास करते हैं। संवाद करते हैं।
सब पचा लेते हैं-
उनका बड़ा उदर (पेट) साधारण नहीं है। वे सब कुछ पचा जाते हैं। समाज और संगठन में हो रही हर अच्छी- बुरी बातों को संभालते हैं। उनका बड़ा पेट इस बात को बताता है कि कैसे लीडर को काम करना चाहिए । किस तरह उसको बिना विचलित हुए बहुत सारी निंदा, आलोचना और सुझावों को आत्मसात करते हुए पचा जाना चाहिए। वे निरंतर परिशुद्ध होते जाते हैं। समस्याओं का समाधान करते हुए लोकमंगल का व्रत निभाते हुए। वे कड़े भी हैं सरल भी। उनके हाथ में अंकुश भी है और पाश भी है। वे जानते हैं कि कब उन्हें कठोर होना है और कब सामान्य जनों को अपने प्रेम पाश में बांध कर रखना है। इसलिए देखिए तो गणेश जी बच्चों के सबसे प्रिय देवता हैं,वे अपने से लगते हैं। तो श्रेष्ठ जनों में उनको लेकर अलग पूज्य भाव दिखते हैं। इस तरह गणेश जी का कवरेज एरिया बहुत व्यापक है।
गणेश जी संकटों से घबराते नहीं रास्ता दिखाते हैं। वे ही हैं जिन्हें विध्नहर्ता कहा गया। ‘रिस्क मैनेजमेंट’ उनकी विशेषज्ञता का क्षेत्र है। उनको समाधान ही दिखते हैं, संकट नहीं। वे संकट को भांपकर उपयुक्त समाधान देते हैं। विविधता की स्वीकार्यता उनका गुण है। वे अपने पिता शिव के समस्त गणों से भी संवाद रखते हैं। जिनमें भूत,प्रेत, पशु, देवता सभी शामिल हैं। इतने विविध समुदायों से संवाद और उनका साहचर्य प्राप्त करते हुए वे विविधता को साधने वाले देवता बन जाते हैं। जिनके लिए कोई भी अलग नहीं है, पराया नहीं है। सभी उनके हैं। महान प्रबंधक कैसे विविध लोगों को साधते हैं। गणेश इसके उदाहरण हैं। वे माता-पिता दोनों के प्रिय हैं। दुलारे हैं। वे सभी के लिए गणपति हैं। सभी उन्हें प्रथम पूज्य मानते हैं। अपने जीवन के आरंभ में ही हुई महान दुर्धटना से उन्होंने खुद को उबार लिया। उसका दुख उन्होंने कभी प्रकट नहीं किया। वे बताते हैं जिंदगी रुकती नहीं आगे भी चलती है। आइए हम अपने देवों की सिर्फ प्रतीकात्मक पूजा न करें बल्कि उनके जीवन से सीखें भी और अनुसरण भी करें।
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। )

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग में आचार्य और अध्यक्ष हैं। भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी), दिल्ली के महानिदेशक रह चुके हैं। 32 पुस्तकों का लेखन और संपादन किया है।
