नई दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए आंदोलन और उसके बाद की परिस्थितियों के संदर्भ में ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म पर चलनेवाले वेबसीरीज में दी जानेवाली गालियों को लेकर चर्चा हो रही है। इसके पहले जी-5 पर फिल्म सतलुज के प्रदर्शित होने और उसको हटाने के बाद ओटीटी पर अंकुश लगाने के पक्ष और विपक्ष में तर्क रखे जा रहे हैं। उधर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने संसदीय समिति को बताया कि ओटीटी के विनियमन के लिए एक विस्तृत संवैधानिक फ्रेमवर्क तैयार किया जा रहा है। ये भी जोड़ा गया कि विनियमन को इस तरह से तैयार किया जा रहा है ताकि किसी व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वाधीनता बाधित ना हो। इस रिपोर्ट में एक और दिलचस्प बात कही गई है। वो ये सरकार ओटीटी प्लेटफार्म पर किसी वेबसीरीज या फिल्म के रिलीज होने के बाद विशेषज्ञों के पैनल से समीक्षा पर विचार कर रही है। अगर सीरीज या फिल्म में किसी प्रकार की आपत्तिजनक सामग्री हो तो उसको हटाने का उपक्रम किया जा सके। जानबूझकर मैंने इस संभावना को दिलचस्प कहा। अगर कोई फिल्म या वेबसीरीज रिलीज हो गई तो उसको भारत में तो हटवाया जा सकता है लेकिन क्या भारत के बाहर के दर्शकों के लिए हटवाया जा सकता है। तकनीक के विस्तार से ये लगभग मुमकिन नहीं है। फिल्म सतलुज के केस में हमने ये देखा कि जी 5 से फिल्म को हटवा देने के बाद भी वो इंटरनेट पर उपलब्ध रही। इस रिपोर्ट में ये भी माना गया है कि ओटीटी प्लेटफार्म ने मनोरंजन की दुनिया में पारंपरिक मनोरंजन के साधन यथा सिनेमा को पीछे छोड़ दिया है। फिल्मों में तो प्रदर्शन के पूर्व प्रमाणन की व्यवस्था है लेकिन ओटीटी मुख्यतया स्वनियमन के फार्मूले पर कार्य करती है। इसमें दर्शकों की उम्र को चेक करने का कोई मैकनिज्म भी नहीं है जिससे बहुधा कम उम्र के बच्चे भी सेक्सुअल कटेंट या गाली गलौच वाले संवादों से भरी सीरीज देखते हैं। इसका प्रभाव भी उनपर पड़ता है। इतना ही नहीं कई बार तो इस तरह के कटेंट सामने आते हैं जो समाज में वैमनस्यता परोसते हैं। दो समुदायों के बीच में कटुता बढ़ाते हैं। अब सूचना और प्रसारण मंत्रालय पोस्ट रिलीज पैनल के माध्यम से इसको विनयमित करना चाहती है। जब भी किसी वेबसीरीज या फिल्म को लेकर दर्शकों की शिकायत आएगी तो ये पैनल उसको देखेगी। अपने सुझावों से मंत्रालय को अवगत कराएगी।
अभी भी लगभग इसी तरह की व्यवस्था है। स्वनियमन की त्रिस्तरीय व्यवस्था में शिकायत मिलने पर मंत्रालय की समिति विचार करती ही है। उसके बाद निर्णय करती है। इस तरह के कई उदाहरण है। 2024 में श्रीराम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का आयोजवन होनेवाले था। उससे एक महीने पहले नेटफ्लिक्स पर एक तमिल फिल्म अन्नपूर्णी, द गाडेस आफ फूड रिलीज की गई। नेटफ्लिक्स पर प्रसारित इस फिल्म में दिखाया गया था एक ब्राह्मण लड़की देश का श्रेष्ठ शेफ बनना चाहती है। उसको बताया गया कि इसके लिए उसको नानवेज खाना बनाना सीखना होगा। इस फिल्म के संवाद में प्रभु श्रीराम को मांसाहारी बताया गया। हिंदू लड़की को नमाज पढ़ते हुए दिखाया गया। तर्क दिया गया कि उसने बिरयानी बनाना एक मुस्लिम महिला से सीखा था इसलिए आभार प्रकट करने के लिए नमाज पढ़ी। नेटफ्लिक्स पर आने के बाद इसके संवाद और दृष्यों को लेकर मुकदमा हुआ। केस होने के बाद इसके निर्माता कंपनी ने क्षमा मांगी। इस फिल्म को नेटफ्लिक्स से हटाया गया। एक तो इसके प्रदर्शन के टाइमिंग पर विचार करना चाहिए। पहले ही फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी थी। दर्शक इसको नकार चुके थे। लेकिन प्राण प्रतिष्ठा के कुछ दिनों पूर्व इसको ओटीटी पर रिलीज करने के पीछे की मंशा क्या थी। इस तरह की स्थितियों में पोस्ट रिलीज पैनल की क्या भूमिका होगी। क्या मुकदमा होने के बाद वो फिल्म देखेगी। क्या दर्शकों की आपत्ति या शिकायत के बाद फिल्म देखेगी। सरकारी प्रक्रिया में जबतक पैनल देखेगी तबतक कितना समय बीत चुका होगा। किसी भी वैधानिक फ्रेमवर्क को बनाने के पहले इन बातों और पहलुओं पर विचार करना चाहिए।
ओटीटी पर लेकर हो रही तमाम चर्चाओं के बीच एक ऐसी सिरीज आई जिसको लेकर किसी भी प्रकार का विवाद संभव नहीं है। नाम है आपरेशन सफेद सागर। 1999 के कारगिल युद्ध के समय भारतीय वायुसेना के आपरेशन पर आधारित छह एपिसोड की इस सीरीज में निर्देशक ओनी सेन ने अपने क्राफ्ट, संवाद और परिस्थितियों की रचना इस प्रकार से की है कि दर्शक बंधा रहता है। इस सीरीज में सिर्फ काकपिट और युद्ध की कहानी ही नहीं है। शांति के समय पायलटों और उनके परिवारों की भावनाओं का सुंदर चित्रण भी है। युवा और अनुभवी पायलटों के जीवन को इस तरह से दिखाया गया है जो लगभग वास्तविक जैसा है। एक युवा पायलट की प्रेमिका जब अपने घर से भागकर एयरफोर्स स्टेशन पहुंचती है तो उसके बाद के दृष्य एकदम वास्तविक प्रतीत होते हैं। लड़की को बगैर मेकअप या गहरे मेकअप के पेश करने का जोखिम निर्देशक ने उठाया है। इसी तरह से इस सीरीज के केंद्रीय पात्रों में से एक स्कावड्रन लीडर अजय आहूजा, जिसका किरदार सिद्धार्थ ने निभाया, ने बहुत ही स्वाभिवक ढंग से निभाया गया है। उनकी पत्नी अलका आहूजा का किरदार अमृता बागची ने निभाया है। कैसे सीनियर पायलट का परिवार भी जूनियर पायलट के परिवार को बातों बातों में ट्रेनिंग देते हैं। इसको स्वाभाविक तरीके से संवाद के माध्यम से चित्रित किया गया है। युवा पायलट की प्रेमिका अजय आहूजा के घर में रहती है। एक दिन बातों बातों में अलका आहूजा उससे कहती है कि जब भी उसके पति जहाज लेकर जाते हैं उस दिन वो झगड़ा नहीं करती। लेकिन शिकायतों की सूची बनाते रहती हैं। जब उनके पति को जहाज नहीं उड़ाना होता है उसदिन वो सारा हिसाब बराबर कर लेती हैं। वेबसीरीज आपरेशन सफेद सागर एयरफोर्स से जुड़े पायलटों की जीवन की तमाम बारीकियों को छूती है। रिश्तों की संवेदना को इस तरह से उकेरती है कि कई बार दर्शकों की आंखें भर आती हैं। बेहद सधा हुआ संवाद। कोई पात्र अकारण लाउड नहीं होता है। कई बार तो पात्रों के बीच की चुप्पी बहुत कुछ कह जाती है।
इस वेब सीरीज के पहले भी माधुरी दीक्षित अभिनीत क्राइम थ्रिलर मिसेज देशपांडे आई थी। वो भी सलीके से बनाई गई थी। दरअसल जिन निर्देशकों को अपने हुनर और कहानी पर भरोसा होता है वो अकारण यौनिकता, हिंसा, गाली गलौच नहीं दिखाते। जिनको अपने हुनर पर भरोसा नहीं होता और जो कला में वैचारिकी की मिलावट करते हैं। राजनीति करते हैं। उससे सफलता का रसायन तैयार करना चाहते हैं। उससे ही विवाद खड़े होते हैं। ओटीटी को लेकर अगर सरकार को विनियमिन की व्यवस्था करनी है तो पोस्ट रिलीज पैनल के स्थान पर प्री रिलीज पैनल बनाने पर विचार करना होगा। ताकि अकारण नग्नता और अश्लीलता परोसने पर तो लगाम लगे ही सीरीज के बहाने राजनीति करनेवालों की पहचान भी हो सके। उनके मंसूबों को नाकाम किया जा सके। इससे ना केवल विवाद कम होंगे बल्कि अकारण सरकारी कामकाज भी नहीं बढ़ेगा।

लगभग ढाई दशक से पत्रकारिता में सक्रिय अनंत विजय इस समय हिंदी में सबसे अधिक पढ़े जाने वाले समाचार पत्र दैनिक जागरण में कार्यरत हैं। उनको सिनेमा पर सर्वश्रेष्ठ लेखन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार स्वर्ण कमल से पुरस्कृत किया जा चुका है। उनको पत्रकारिता का सर्वोच्च सम्मान गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार और बिहार सरकार का फादर कामिल बुल्के सम्मान मिला है। उन्होंने अब तक 15 पुस्तकों का लेखन किया है।