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मीडिया में दिख रहा है किस औरत का चेहरा!

औरत की देह इस समय मीडिया का सबसे लोकप्रिय विमर्श है । सेक्स और मीडिया के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है, उसने सारे मूल्यों को शीर्षासन करवा दिया है । फिल्मों, इंटरनेट, मोबाइल, टीवी चैनलों से आगे अब वह मुद्रित माध्यमों पर पसरा पड़ा है। मीडिया ने उदारीकरण के बाद बाजार में एकदम नई औरत उतार दी है, जो आत्मविश्वास से भरी है और तमाम वर्जित क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए उत्सुक है। इस सबके बीच मीडिया की कुछ सकारात्मक भूमिका भी है जो रेखांकित की जानी चाहिए। औरत की एक नई पहचान बनाने और स्थापित करने में उसने एक बड़ी भूमिका निभाई है। सौंदर्य एवं आकर्षण से इतर एक महत्वाकांक्षी और कर्मठ छवि बनाने में मदद की है। महिला अधिकार और स्वतंत्रता के साथ-साथ परिवार के अंदर वह एक निर्णायक भूमिका में नजर आ रही है। महिला उद्ममिता के साथ-साथ समाज में महिलाओं के संघर्ष को भी मीडिया ने स्वर दिया है। किंतु कुछ सकारात्मक पक्षों के साथ उसका महिला को एक सेक्स आब्जेक्ट के रूप में पेश करने का रवैया सबसे खतरनाक है, जो उसके सभी पुण्यकर्मों पर पानी फेर देता है।

प्रिंट मीडिया जो पहले अपने दैहिक विमर्शों के लिए ‘प्लेबाय’ या ‘डेबोनियर’ तक सीमित था अब दैनिक अखबारों से लेकर हर पत्र-पत्रिका में अपनी जगह बना चुका है। अखबारों में ग्लैमर वर्ल्र्ड के कॉलम ही नहीं खबरों के पृष्ठों पर भी लगभग निर्वसन विषकन्याओं का कैटवाग खासी जगह घेरा रहा है। वह पूरा हल्लाबोल 24 घंटे के चैनलों के कोलाहल और सुबह के अखबारों के माध्यम से दैनिक होकर जिंदगी में एक खास जगह बना चुका है। प्रिंट मीडिया अब इससे होड़ ले रहा है। इंटरनेट ने सही रूप में अपने व्यापक लाभों के बावजूद सबसे ज्यादा फायदा सेक्स कारोबार को पहुँचाया । पूंजी की ताकतें सेक्सुएलिटी को पारदर्शी बनाने में जुटी है। महानगरों में लोगों की सेक्स हैबिट्स को लेकर भी मुद्रित माध्यमों में सर्वेक्षण छापने की होड़ है।

सेक्स को बार-बार कवर स्टोरी का विषय बनाकर ये उसे रोजमर्रा की चीज बना देना चाहते हैं । इस षड़यंत्र में शामिल मीडिया बाजार की बाधाएं हटा रहा है। फिल्मों की जो गंदगी कही जाती थी वह शायद उतना नुकसान न कर पाए जैसा धमाल इन दिनों मुद्रित माध्यम मचा रहे हैं । कामोत्तेजक वातावरण को बनाने और बेचने की यह होड़ कम होती नहीं दिखती । मीडिया का हर माध्यम एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में है। यह होड़ है नंगई की । फिल्मों ने बाज़ार में एक नई हिंदुस्तानी औरत उतार दी है । जिसे देखकर समाज चमत्कृत है। कपड़े उतारने पर आमादा इस स्त्री के दर्शन के दर्शन ने मीडिया प्रबंधकों के आत्मविश्वास को हिलाकर रख दिया सेक्स सांस्कृतिक विनिमय की पहली सीढ़ी है। शायद इसीलिए जब कोई भी हमलावर किसी भी जातीय अस्मिता पर हमला बोलता है तो निशाने पर सबसे पहले उसकी औरतें होती हैं । यह बाजारवाद अब भारतीय अस्मिता के अपहरण में लगा है, निशाना भारतीय औरतें हैं । एक समय में भारतीय स्त्री के सौंदर्य पर विश्व का अचानक मुग्ध हो जाना, देश में मिस युनीवर्स, मिस वर्ल्ड की कतार लग जाना-खतरे का संकेतक ही था। हम उस षड़यंत्र को भांप नहीं पाए । अमरीकी बाजार का यह अश्वमेघ, दिग्विजय करता हुआ हमारी अस्मिता का अपहरण कर ले गया।

लांछन अब इस दौर में उपलब्धियों में बदल रहे हैं । ‘भोगो और मुक्त हो,’ यही इस युग का सत्य है। कैसे सुंदर दिखें और कैसे ‘मर्द’ की आंख का आकर्षण बनें यही पहिला पत्रकारिता का मूल विमर्श है । जीवन शैली अब ‘लाइफ स्टाइल’ में बदल गया है । बाजारवाद के मुख्य हथियार ‘विज्ञापन’ अब नए-नए रूप धरकर हमें लुभा रहे हैं । नग्नता ही स्त्री स्वातंत्र्य का पर्याय बन गयी है। मेगा माल्स, ऊँची ऊँची इमारतें, डियाइनर कपड़ों के विशाल शोरूम, रातभर चलने वाली मादक पार्टियां और बल्लियों उछलता नशीला उत्साह । इस पूरे परिदृश्य को अपने नए सौंदर्यबोध से परोसता, उगलता मीडिया एक ऐसी दुनिया रच रहा है जहाँ बज रहा है सिर्फ देहराग, देहराग और देहराग।

इन तमाम संकटों के बीच भी स्त्री आज के समय में वह घर और बाहर दोनों स्थानों अपेक्षित आदर प्राप्त कर रही है। वह समाज को नए नजरिये से देख रही है। उसका आकलन कर रही है और अपने लिए निरंतर नए क्षितिज खोल रही है।ऐसी सार्मथ्यशाली स्त्री को शिखर छूने के अवसर देने के बजाए हम उसे बाजार के जाल में फंसा रहे हैं। वह अपनी निजता और सौंदर्यबोध के साथ जीने की स्थितियां और आदर समाज जीवन में प्राप्त कर सके हमें इसका प्रयास करना चाहिए। हमारे समाज में स्त्रियों के प्रति धारणा निरंतर बदल रही है। वह नए-नए सोपानों का स्पर्श कर रही है। माता-पिता की सोच भी बदल रही है वे अपनी बच्चियों के बेहतर विकास के लिए तमाम जतन कर रहे हैं। स्त्री सही मायने में इस दौर में ज्यादा शक्तिशाली होकर उभरी है। किंतु बाजार हर जगह शिकार तलाश ही लेता है। वह औरत की शक्ति का बाजारीकरण करना चाहता है। हमें देखना होगा कि भारतीय स्त्री पर मुग्ध बाजार उसकी शक्ति तो बने किंतु उसका शोषण न कर सके। आज में मीडियामय और विज्ञापनी बाजार में औरत के लिए हर कदम पर खतरे हैं। पल-पल पर उसके लिए बाजार सजे हैं। देह के भी, रूप के भी, प्रतिभा के भी, कलंक के भी। हद तो यह कि कलंक भी पब्लिसिटी के काम आ रहे हैं। क्योंकि यह समय कह रहा है कि दाग अच्छे हैं। बाजार इसी तरह से हमें रिझा रहा है और बोली लगा रहा है। हमें इस समय से बचते हुए इसके बेहतर प्रभावों को ग्रहण करना है। मीडिया के उजले पक्ष की व्यापक उपस्थिति भी दिखती है। टीवी माध्यम के विस्तार ने युवतियों और महिलाओं को एक नई शक्ति दी है। न्यूज रूम जो प्रिंट मीडिया की शाहंशाही में पुरूषों से भरे थे, अब टीवी मीडिया दौर में न्यूज रूम औरतों की उपस्थिति से ही नई पहचान अर्जित कर रहे हैं। टीवी पर दिखने के अलावा उसके पीछे भी स्त्रियों की एक बड़ी शक्ति ही काम कर रही है।

समूचा परिदृश्य बताता है कि मुख्यधारा के मीडिया में स्त्री के सवाल उस तरह से स्थापित नहीं हो सके हैं जिस परिमाण में स्त्री शक्ति का प्रकटीकरण हुआ है। उसके पूरे चरित्र में आज भी एक असंतुलन है। यह एक मीडिया की नाकामी ही है, जिस पर उसे निरंतर आत्मालोचन की जरूरत है।1949 में सिमोन द बोवुआर ने अपनी किताब ‘द सेकंड सेक्स’ में स्थापना दी थी कि “औरत पैदा नहीं होती बल्कि बनाई जाती है।” उनकी बात आज भी प्रासंगिक है क्योंकि हमारे तमाम भौतिक विकास के बावजूद हम मानसिक और सामाजिक स्तर पर स्त्री को वह जगह नहीं दे पाए हैं जिसकी वह हकदार है। मीडिया भी इससे मुक्त नहीं है क्योंकि वह भी इसी सामाजिक व्यवस्था से खाद-पानी पीकर बनता और प्रभावी होता है।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

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